इतिहास में दिवाली का सबसे प्राचीनतम वर्णन नीलमत पुराण में मिलता है, जो कश्मीर में पांचवी व आठवी शताब्दी ईसा के बाद रची गई थी।

नीलमत पुराण में “दीपमाला” त्यौहार का विस्तार में जिक्र है। इसके अनुसार इस त्यौहार के दिन चारो तरफ प्रकाश व रोशनी का इंतजाम रहता है, फूलों की माला द्वारा घरों को सुसज्जित किया जाता है, ब्राह्मणों, रिश्तेदारों व आश्रितों के साथ भोज किया जाता है, जुआ खेला जाता है, संगीत सुना जाता है, औरतों की संगत में रात व्यतीत की जाती है, महंगे कपड़े व आभूषण पहने जाते हैं, दोस्तों, रिश्तेदारों, ब्राह्मणों व नौकरों को कपड़े दान दिए जाते हैं।

इस पुराण में यह भी वर्णित है कि दीपमाला त्यौहार कार्तिक मास की अमावस्या को मनाया जाता है!

यह इस बात की और इशारा करता है कि आज दिवाली के साथ जो राम के अयोध्या वापिस लौटने की कथा जोड़ी गई है वह कोरी कल्पना है और यह काफी हद तक संभव है की यह कथा पुष्यमित्र शुंग की याद में गड़ी गई हो, क्योंकि उसने ब्राह्मण धर्म का राज स्थापित किया था।

दिवाली अंततः एक ब्राह्मणवादी त्यौहार रहा है और इस समय की बाकी ब्राह्मणवादी रीतियों की तरह, यह भी बौद्ध धम्म का कभी हिस्सा नहीं रहा है।

फिर भी, कई जातियों में, खास तौर से तथाकित निचली जातियों में,  दिवाली के आस पास के पांच दिनों में, कई ऐसी रीतियों का पालन होता रहा है जिस से ऐसा प्रतीत हो सकता है दीवाली सिर्फ ब्राह्मणवादी त्यौहार नहीं था।

यह इस बात की और भी इशारा करता है कि ब्राह्मणों द्वारा दीवाली के लिए कैलेंडर में जो दिन चुने गए थे वह इन निचली जातियों के स्थानीय रीति रिवाजों से प्रेरित थे।

लेकिन इस बात को भी नकारा नहीं जा सकता की निचली जातियों के स्थानीय रीति रिवाज, संस्कृतिकरण का शिकार थे और ब्राह्मणवादी व्यवस्था में जगह बनाने के लिए उन्होंने दिवाली से संबंधित रीति रिवाज अपनाने शुरू किए हो। क्योंकि प्रभुत्व वर्ग का प्रभाव जाने अंजाने शोषित वर्ग पर आ ही जाता है! 

इन बातों की पुष्टि इसलिए होती है क्योंकि इतिहास में कोली, भील व अन्य निचली जातियों का वर्णन है की कैसे वो दीवाली के सप्ताह के दौरान मांस का सेवन करते थे और श्मशान में मिट्टी के दिए जलाते थे!

जहां तक मुझे मालूम है (आप मुझे बता सकते हैं अगर मैं गलत हूं तो), बौद्ध धम्म ब्राह्मणवादी रीति रिवाजों से स्पष्ट दूरी बनाए रखता था और स्थानीय रीति रिवाज जो कई जातियों में व्याप्त थे उनसे भी प्रभावित नहीं था। बौद्ध धम्म की प्राक्कल्पना ही तार्किक विचारों में निहित थी। तो यह काफी हद तक संभव है की बौद्ध धम्म में दीवाली जैसा कोई त्यौहार नहीं था!

ऐसे स्पष्ट संदर्भ मौजूद हैं जो यह बतलाते है की दीवाली जैनों का भी प्रमुख त्यौहार था। जैन दीवाली के दिन को भगवान महावीर के मोक्ष प्राप्ति के दिवस के रूप में मनाते आए हैं। ऐसे ही धनतेरस भी जैनों के लिए प्रमुख दिनों में से एक था। धनतेरस व्यापारिक समुदायों में प्रमुखता से मनाया जाता रहा है और उस समय (आज भी), जैन धर्म व्यापारिक समुदायों में खास तौर पर प्रचलित था।

जहां तक दीए जलाने की बात है तो उन दिनों जाहिर तौर पे यह सबसे प्रचलित तरीका रहा होगा किसी भी प्रमुख दिवस को मनाने का, क्योंकि उन दिनों प्रकाश का स्त्रोत दिए ही थे। तो इसलिए काफी निचली जातियों में भी दिए जलाने की परंपरा बरकरार रही है, और इसका सीधे तौर से यह मतलब नहीं है की वो ब्राह्मण धर्म से प्रभावित थे।