
ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो अछूतों की दयनीय स्थिति से दुखी हो यह चिल्लाकर अपना जी हल्का करते फिरते हैं कि ‘हमें अछूतों के लिए कुछ करना चाहिए।’ लेकिन इस समस्या को जो लोग हल करना चाहते हैं, उनमें से शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह कहता हो कि “हमें सवर्ण हिंदुओं को बदलने के लिए भी कुछ करना चाहिए।’ यह धारणा बनी हुई है कि अगर किसी का सुधार होना है तो वह अछूतों का ही होना है। अगर कुछ किया जाना है तो वह अछूतों के प्रति किया जाना है और अगर अछूतों को सुधार दिया जाए, तब छुआछूत की भावना मिट जाएगी। सवर्णों के बारे में कुछ भी नहीं किया जाना है। उनकी भावनाएं, आचार-विचार और आदर्श उच्च हैं। वे पूर्ण हैं, उनमें कहीं भी कोई खोट नहीं है। क्या यह धारणा उचित है? यह धारणा उचित हो या अनुचित, लेकिन हिंदू इसमें कोई परिवर्तन नहीं चाहते? उन्हें इस धारणा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि वे इस बात से आश्वस्त हैं कि वे अछूतों की समस्या के लिए बिल्कुल भी उत्तरदायी नहीं हैं।”
~ अछूत अथवा भारत की बहिष्कृत बस्तियों के प्राणी में बाबा साहेब अंबेडकर
भारत एक अजीब देश है और पश्चम वासियों को पूर्व वासी भारत के सम्मोहन ने हमेशा हैरान किया है। पश्चिम वासी समाजशास्त्रियों ने भारतीय समाज का गहनता से अध्ययन किया है, ऐसा समाज जो प्रमुखता से जाती प्रधान समाज है।
अल बरूनी से लेकर फाहियान, एबे दूब्वाह से लेकर लुई दूमों, सूसन बेली से लेकर निकोलस डर्क्स, कई पाश्चात्य समाजशास्त्री व बुद्धिजीवियों ने हिंदू सामाजिक व्यवस्था को समझाने व प्रतिपादित करने के कई प्रयास किए हैं। इन सभी ने अपने अपने मूलभूत प्रस्तावों के जरिए काफी प्रयास किए हैं जाती के प्रश्न को समझने व समझाने में परंतु ये सभी अनिवार्य रूप से अछूतों के उत्थान के लिए कोई विशेष समाधान देने में असमर्थ रहे हैं।
ऐसा क्यों है कि सवर्णों द्वारा किए जाने वाले सुधार का प्रमुख केंद्र अछूत ही रहते हैं? इस बात पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता है कि सुधार की जरूरत सवर्णों को है। सवर्णों को मानवता सिखाई जानी चाहिए। सुधार का केंद्र बिंदु अछूत न होकर सवर्ण होने चाहिए।
कभी कभी व ज्यादा से ज्यादा, उदार व प्रगतिशील सवर्ण अगर कुछ सोच सकता है तो वह अछूतों का तारणहार बनने की भावना तक ही सीमित है, लेकिन उसके ऐसा सोचने से समाज की मौजूदा स्थिति में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आता।
अभी हाल ही में उच्च न्यायालय ने अपने एक फैंसले में अनुसूचित जाति व जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम में दर्ज एक मुकदमे को खारिज कर दिया। ऐसा करने में उच्च न्यायालय ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 142 द्वारा उसको दिए गए विशेषाधिकार का उपयोग किया।
न्यायालय ने अपने निर्णय में यह कहा की दोषी ने दलित महिला को, जो उसकी पड़ोसी भी है, उन दोनों के बीच चल रहे संपत्ति विवाद के कारण कुंठा में आकर गाली दी।
यह तो अच्छी तरह से सब को मालूम है कि ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाए तो हिंदू धर्म शास्त्र मनु स्मृति के अनुसार अछूतों को धन संपदा, संपत्ति व जमीन के अधिग्रहण का अधिकार नहीं था। क्या उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को यह बिलकुल भी नहीं सूझा कि एक अछूत और सवर्ण के बीच हुए संपत्ति विवाद में जातिवादी मानसिकता का प्रच्छन भाव भी हो सकता है।
उस सवर्ण दोषी की वह कुंठा या कहें निराशा कहीं बाहर से नहीं आई। वह अछूतों के प्रति उसकी तिरस्कार व ईर्ष्या की भावना को दर्शाता है।
क्या न्यायधीशो का यह अपेक्षा करना की कोई भी अछूत अपमानजनक जातिवादी टिप्पणियों को सिर्फ इसलिए सुनता रहे क्योंकि कोई सवर्ण निराश है या कुंठित है, नैतिक रूप से अनुचित नहीं है?
नाजी पूर्व यूरोप में यहूदियों के नाम उपहास के तौर पर रखे जाते थे। उनके नाम मखौल का पात्र रहते थे। कोई ऐसा सोच सकता है कि केवल किसी व्यक्ति का गाली से भरे शब्दों से उसका मजाक बनाने व उसकी पूरी बिरादरी का अपमान करने में इतनी शक्ति कहां हो सकती की उस व्यक्ति व उसकी पूरी बिरादरी की जिंदगियां ही तबाह कर दें। परंतु आज पूरी दुनिया यह देख व जान चुकी है कि कैसे यहूदियों के प्रति तिरस्कार व निरादर की भावना, नाजी जर्मनी के कुख्यात तानाशाह हिटलर के शासन में यहूदियों के नरसंहार में तब्दील हो गई।
क्या भारत इसी बात का इंतजार कर रहा है कि भविष्य में कोई जातिवादी श्रेष्ठता में विश्वास रखने वाला तानाशाह आए और अछूतों का भी वही हश्र हो जो यहूदियों का हिटलर के राज में हुआ?
अगर ऐसा नहीं है तो फिर भारत सरकार की ऐसी कोई पुख्ता नीति क्यों नही है जो इस पर बात का ध्यान रखे कि अछूतों की गरिमा की इज्जत की जानी चाहिए। ऐसे सवर्ण जो जातिवादी मानसिकता से ग्रसित हैं, उनको ऐसी शिक्षा क्यों नही दी जाती की वह अपने घरों में सिखाए गए जातिवादी मूल्यों को त्याग दें, अछूतों के प्रति संवेदनशील बनें और एक बेहतर इंसान बनें।
भारतीय शिक्षा प्रणाली में कोई ऐसा पाठ्यक्रम क्यों नही है जो विद्यार्थियों को अछूतों के प्रति होते आए और वर्तमान में हो रहे अत्याचारों के बारे में अवगत करवाए, भले ही वो अत्याचार केवल मौखिक जातिसूचक गालियां हो, जानलेवा हमले हों या फिर जान से मार देना।
