“घीसू और माधव समाज के उस तबके से आते हैं जो सदियों से गरीबी और अभाव में जीने को मजबूर है। उनकी छाया भर से उच्चवर्णी समाज अपवित्र हो जाता है। आज इक्कीसवीं सदी में भी उनकाआर्थिक-सामाजिक-राजनीतिक भागीदारी व बुनियादी हक जैसे सरल सवाल पर वह बौखला उठता है। घीसू और माधव दमन व शोषण पर आधारित इसी घोर असंवेदनशील सामाजिक व्यवस्था की उपज हैं जिसने उनकी सारी मानवीय संवेदनाओं को पत्थर कर डाला है”
तो यह पंक्तियां कोई तो मित्र रंजन की है। जो इन्होंने आपने ब्लॉग जनपथ पर लिखे एक लेख में लिखी हैं! इनकी जाती क्या है मुझे ज्ञात नहीं है लेकिन भाषा से ये सवर्ण ही नजर आ रहे हैं.
तो मैं आपको बता दूं यहां मित्र रंजन सामंत के मुंशी प्रेमचन्द की कहानी ‘कफन’ का जिक्र कर रहे हैं. इस कहानी में संक्षिप्त में बताऊं तो घीसू और माधव बाप बेटे हैं और वह दोनों माधव की बीवी बुधिया को प्रसव पीड़ा में अकेले छोड़ देते हैं जिससे वो मर जाती है.
यहां मित्र रंजन कह रहे हैं की दमनकारी सामाजिक संरचना में रहकर दलितों की मनोस्थिति का यह हाल हुआ है कि वह अपने बीवियों को प्रसव में मरने को छोड़ दे रहे हैं.
ये कितनी घृणित सोच है यह आपको स्वयं मालूम पड़नी चाहिए. माना की दलित समाज एक दमनकारी व्यवस्था से जूझता रहा है लेकिन क्या इसका यह अर्थ है की हमारे अंदर मानवीय गरिमा ही नही बची है? क्या हम दलित इतने निर्मम हो गए हैं की अपनी औरतों को जानबूझ कर ऐसे मरने के लिए छोड़ दे रहे हैं?
अधिकांश बिकाऊ लोग और सवर्ण तुष्टिकरण के लोभी दलित लोगों को इसमें प्रेमचंद का मानवीय चेहरा नजर आ रहा है की वो दलितों का दर्द समझ रहे हैं और उसे बयान कर रहे हैं.
मेरा सवाल यह है की क्या जातीय सरंचना में सिर्फ दलित की ही मनोस्थिति प्रभावित होती है? दलित ही मानसिक रोगी बनता है? दलित ही अपंग बनता है? क्या वह सवर्ण जो रोज इतनी जुल्म करते है और मानव को मानव नहीं मानते उनके मनोस्थिती बदतर नहीं होती?
यहां तो सीधे तौर पर सामंत के मुंशी ने और मित्र रंजन ने दलितों को मानसिक रोगी ही घोषित कर दिया है!
जबकि दलित हमेशा संघर्षरत रहा है, इतनी यातनाएं झेलने के बाद भी उसका जीवन सहनशीलता की परम पराकाष्ठा है और सामंत का मुंशी ये साबित करने पे तुला है की दलित जातीय सरंचना में इतना बौरा गया है की वह अपनी औरतों को मरता हुआ छोड़ शराब के नशे में धुत रहता है!
कपोल कल्पना में सामंत के मुंशी ने दलित को इतना निर्मम व मानवीय संवेदना से मुक्त दिखा दिया लेकिन यथार्थ तो यही है की दलित अपनी बीवी को प्रसव पीड़ा में छोड़ उसकी हत्या नहीं करता, दलित दशरथ मांझी है जो अपनी बीवी के लिए पहाड़ तक में रास्ता बना देता है।
इन महानुभावों से कोई पूछे की द्विजों ने तो अपनी औरतें जिंदा जलाई हैं, उनकी मनोस्थिती कैसी है इस पर क्या कहने है उनके?
ठाकुर नामवर सिंह को यह पता होना चाहिए, क्योंकि वो खुद को अंबेडकर से प्रभावित भी मानते है की अंबेडकर ने ज्ञान समझी जाने वाली मनुस्मृति का न सिर्फ एक उम्दा ज्ञान से जवाब दिया था बल्कि मनुस्मृति को जला के राख भी किया था!
तो ठाकुर हमे बामन निराला की पंक्ति “आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर” हम दलितों को न सिखाएं!
वैसे भी द्विज साहित्य साहित्य हो सकता है एक बार को, उसको ज्ञान मानने की भूल हम दलित कभी न कियें है और न करेंगे!
“ज्ञान के क्षेत्र में ज्ञान से लड़ाई होती है। लाठी, डंडे, तलवार, बंदूक से नहीं होती है।”
ये बोल हैं ठाकुर नामवर सिंह के जहां वो दलित साहित्यकारों द्वारा प्रेमचन्द के criticism करने पर उनको संबोधित कर रहे हैं!
ठाकुर से पूछा जाना चाहिए की दलित साहित्यकारों ने कोंसे लाठी डंडे चला दिए? कौनसी तलवार बंदूक चला दी?
~दलित अच्छी कहानियाँ लिखकर के दिखायें। क्योंकि ‘आराधन का दृढ़ आराधन से दो उत्तर’।~
ये बोल हैं ठाकुर नामवर सिंह के!
पहली बात तो इन जैसे साहित्यकारों से यह पूछा जाए की सिर्फ इसलिए की प्रेमचंद ने दलितों पर कहानियां लिख दी हैं, तो दलित भी खुद पर कहानियां लिख कर सवर्णों को क्यों दिखाए?
हमने तो नहीं कहा सामंत के मुंशी से की तू हमारे ऊपर कहानी लिख!
क्या दुःखी चमार, सिलियान चमारी, मुन्नू मेहतर से प्रेमचंद ने कंसेंट लिया की मैं तुम्हारी कहानी बयां कर सकूं?
तो ठाकुर और बामनों को अब स्वांग रचना बंद कर देना चाहिए!
ऐसे ऐसे लोगों को साहित्यकार माना जा रहा जो प्रेमचंद को सामंत का मुंशी कहने पर यह कहते है, “प्रेमचंद तो कायदे से कहिये कि मुंशी तो थे लेकिन वे हंस के संपादक थे। जो तमाम लोग कलम चलाने वाले थे हल तो उन्होंने न चलाया न चलवाया “
मतलब ऐसे बेवकूफ आदमी को साहित्यकार माना जा रहा है जिसको शब्दों की समझ तक नहीं है!
इनकी माने तो किस व्यक्ति ने यदि कभी हल न चलाया और न चलवाया तो वह सामंत केसे हो गया?
तुझ बैल की पूंछ पकडूं की सींग? किधर से पकडू तेरी मूर्खता!
सवाल यह है की जब सामंत का मुंशी प्रेमचंद गर्त में जा चुका है। इसकी सारी मटियामेट की जा चुकी है डॉ धरमवीर द्वारा तो फिर चुनिंदा दलित लेखक व लेखिकाएं प्रेमचंद के बचाव में क्यों उतार आए हैं?
सवर्ण तुष्टिकरण के लिए ये चुनिंदा दलित किसी भी हद तक गिर सकते हैं। आए दिन दलित समाज के नौजवान अंतर जातीय विवाह के चक्कर में आकर अपना जीवन बर्बाद और कई बार तो जीवन से हाथ भी धो बैठ रहे हैं लेकिन फिर भी ये चुनिंदा दलित इस बात पर आमादा हैं कि अंतर जातीय विवाह से जाती टूट जाती है।
संदर्भ:
2.https://www.shabdankan.com/2017/03/premchand-remembrance-lecture-by-prof-namwar-singh.html?m=1
