भारत की सबसे बड़ी त्रासदी केवल भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अराजकता या न्यायिक विलम्ब नहीं है। उससे भी बड़ी त्रासदी यह है कि इन सबके विरुद्ध उठने वाले नागरिक के आक्रोश को ही कटघरे में खड़ा कर दिया जाता है। आज इस देश में व्यवस्था की विफलताओं पर जितनी गंभीर बहस नहीं होती, उससे कहीं अधिक बहस इस बात पर होती है कि नागरिक ने अपनी पीड़ा किस भाषा में व्यक्त की। ऐसा लगता है मानो संस्थाओं की जवाबदेही से अधिक महत्वपूर्ण नागरिक की विनम्रता हो गई हो। भ्रष्टाचार पर मौन स्वीकार्य है, परन्तु भ्रष्टाचार पर क्रोध अस्वीकार्य है। अन्याय सहना सभ्यता है, पर अन्याय के विरुद्ध तीखी भाषा बोलना असभ्यता घोषित कर दिया जाता है।

देश का एक बड़ा वर्ग वर्षों से ऐसी व्यवस्थाओं से जूझ रहा है जहाँ नियम पुस्तकों में लिखे होते हैं, पर व्यवहार में उनकी जगह संपर्क, प्रभाव, रिश्वत और राजनीतिक संरक्षण ले लेते हैं। सरकारी दफ्तरों से लेकर विश्वविद्यालयों तक, पुलिस से लेकर स्थानीय प्रशासन तक, और अनेक मामलों में न्याय व्यवस्था तक, आम नागरिक स्वयं को अधिकार-संपन्न नागरिक कम और कृपा की प्रतीक्षा में खड़ा याचक अधिक महसूस करता है। प्रक्रियाएँ इतनी अपारदर्शी हैं कि नागरिक को कभी यह निश्चित नहीं होता कि उसके साथ न्याय होगा या नहीं। कानून का अस्तित्व कागज़ पर दिखाई देता है, लेकिन उसका समान और निष्पक्ष अनुप्रयोग अक्सर संदेह के घेरे में रहता है। ऐसी परिस्थितियों में यदि लोगों के भीतर आक्रोश जन्म लेता है तो वह किसी वैचारिक फैशन का परिणाम नहीं, बल्कि व्यवस्था के साथ बार-बार हुए कटु अनुभवों का स्वाभाविक निष्कर्ष है।

किन्तु जैसे ही यह आक्रोश सार्वजनिक होता है, एक विशेष प्रकार का नैतिक प्रहरी सक्रिय हो जाता है। वह न तो नागरिक की समस्या सुनना चाहता है, न ही उस व्यवस्था पर प्रश्न उठाना चाहता है जिसने उस समस्या को जन्म दिया। उसका पहला प्रश्न होता है—“भाषा ठीक रखिए”, “इतने आक्रामक मत बनिए”, “लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए”, “सभ्य समाज में इस तरह बात नहीं की जाती।” देखते ही देखते पूरा विमर्श बदल जाता है। चर्चा भ्रष्टाचार से हटकर शब्दों पर आ जाती है; प्रशासनिक विफलता से हटकर नागरिक के व्यवहार पर; अन्याय से हटकर शिष्टाचार पर। व्यवस्था पर आरोप लगाने वाला व्यक्ति स्वयं अभियुक्त बना दिया जाता है।

यहीं नैतिकता एक सद्गुण नहीं, बल्कि सत्ता की ढाल बन जाती है। शिष्टाचार का उद्देश्य लोकतांत्रिक संवाद को समृद्ध करना होना चाहिए, लेकिन जब वही शिष्टाचार हर बार संस्थागत आलोचना को निष्प्रभावी करने का माध्यम बन जाए, तब वह लोकतांत्रिक मूल्य नहीं रह जाता; वह यथास्थिति की रक्षा का औजार बन जाता है। नागरिक को यह समझाया जाता है कि व्यवस्था बदलने से पहले उसे अपनी भाषा बदलनी चाहिए। लेकिन यह कोई नहीं पूछता कि यदि व्यवस्था वर्षों तक नहीं बदलेगी तो नागरिक आखिर कितने समय तक अपनी पीड़ा को विनम्र शब्दों में सजाता रहेगा।

इतिहास गवाह है कि सत्ता को चुनौती देने वालों पर सबसे पहला हमला उनके तर्कों पर नहीं, बल्कि उनके स्वर पर होता है। अन्याय के विरुद्ध बोले गए शब्दों की कठोरता पर तो बहस होती है, पर उस अन्याय की कठोरता पर नहीं जिसने उन शब्दों को जन्म दिया। आक्रोश को बीमारी कहा जाता है, जबकि वास्तव में वह किसी गहरे सामाजिक और संस्थागत रोग का लक्षण होता है। यदि नागरिक चिल्ला रहा है, तो लोकतंत्र का पहला दायित्व यह पूछना होना चाहिए कि उसे चिल्लाने की नौबत क्यों आई; न कि सबसे पहले यह सिखाना कि उसे धीरे बोलना चाहिए था।

विडम्बना यह है कि जो लोग नागरिकों की भाषा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील दिखाई देते हैं, वे अक्सर संस्थाओं की विफलताओं के प्रति उतने ही असंवेदनशील होते हैं। कठोर शब्द उन्हें तुरंत विचलित कर देते हैं, लेकिन वर्षों तक न्याय का न मिलना, प्रशासनिक मनमानी, नियमों का चयनात्मक प्रयोग, राजनीतिक संरक्षण और भ्रष्टाचार उन्हें उतना व्यथित नहीं करते। ऐसा प्रतीत होता है कि उनके लिए व्यवस्था की असफलता से अधिक खतरनाक नागरिक का क्रोध है। यह नैतिकता नहीं, बल्कि नैतिकता का चयनात्मक प्रयोग है।

लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा नागरिकों की भाषा से नहीं होती, बल्कि उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता से होती है। नागरिकों को शिष्ट बनने की सीख देने से पहले संस्थाओं को न्यायपूर्ण, पारदर्शी, उत्तरदायी और निष्पक्ष बनाना आवश्यक है। सम्मानजनक भाषा कभी भी न्याय का विकल्प नहीं हो सकती। यदि संस्थाएँ विश्वास खो दें, तो सबसे सुसंस्कृत भाषा भी लोकतंत्र को स्थिर नहीं रख सकती। लोकतंत्र की स्थिरता नागरिकों की चुप्पी से नहीं, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता से आती है।

इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि नागरिक ने कितनी तीखी भाषा का प्रयोग किया। वास्तविक प्रश्न यह है कि ऐसी भाषा बोलने की आवश्यकता आखिर पैदा क्यों हुई। जिस समाज में व्यवस्था बार-बार नागरिक को निराश करती है, वहाँ आक्रोश लोकतंत्र का शत्रु नहीं होता; वह उसकी चेतावनी होता है। जो समाज चेतावनियों को दबाने में अधिक रुचि लेता है और उनके कारणों को दूर करने में कम, वह धीरे-धीरे अपने ही लोकतांत्रिक आधार को खोखला कर देता है। किसी भी राष्ट्र का भविष्य इस बात से तय नहीं होगा कि उसके नागरिक कितनी विनम्र भाषा बोलते हैं, बल्कि इस बात से होगा कि उसकी संस्थाएँ न्याय, समानता और उत्तरदायित्व के प्रति कितनी ईमानदार हैं। जब तक यह प्रश्न सार्वजनिक जीवन के केंद्र में नहीं आएगा, तब तक नैतिक भाषा केवल एक पर्दा बनी रहेगी, जिसके पीछे संस्थागत विफलताएँ सुरक्षित छिपी रहेंगी।