एक आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल उसके द्वारा बनाए गए कानूनों से नहीं, बल्कि उन कानूनों के मानवीय परिणामों से किया जाना चाहिए। प्रत्येक प्रशासनिक परिपत्र, पात्रता मानदंड, आरक्षण नीति, लाइसेंस संबंधी नियम, परीक्षा नियम या नौकरशाही प्रक्रिया किसी व्यक्ति के जीवन की दिशा बदलने की क्षमता रखती है। किंतु जब ये नीतियाँ मनमानी, अविवेकपूर्ण, असंवेदनशील या अनुपातहीन होती हैं, तब उनका पूरा बोझ लगभग हमेशा नागरिक पर ही पड़ता है। राज्य अपनी भूलों का कोई वास्तविक मूल्य नहीं चुकाता; मानसिक, आर्थिक और सामाजिक क्षति केवल व्यक्ति को सहनी पड़ती है।

यह असंतुलन संस्थागत अन्याय के उन रूपों में से एक है जिन पर सबसे कम चर्चा होती है।

जब सरकारें न्यायालय में अपनी मनमानी नीतियों का बचाव करती हैं, तो वे जनता के धन का उपयोग करती हैं। यदि वे मुकदमा हार भी जाएँ, तो न्यायिक व्यय भी सार्वजनिक कोष से ही वहन किया जाता है। दूसरी ओर, वह नागरिक जिसने वर्षों तक एक अविवेकपूर्ण नीति के विरुद्ध संघर्ष किया, उसे शायद ही कभी उसके जीवन पर पड़े वास्तविक प्रभाव के अनुरूप क्षतिपूर्ति मिलती है। खोए हुए शैक्षणिक अवसर, विलंबित करियर, मानसिक तनाव, अवसाद, चिंता, सामाजिक अपमान, पारिवारिक दबाव और आर्थिक अनिश्चितता—ये सब कानूनी उपचारों की भाषा में लगभग अदृश्य रह जाते हैं।

कानून अक्सर अधिकार तो लौटा देता है, लेकिन जीवन नहीं लौटा पाता।

संवैधानिक लोकतंत्रों ने अवैध गिरफ्तारी, हिरासत में हिंसा, दुर्भावनापूर्ण अभियोजन और गैर-कानूनी निरोध के मामलों में क्षतिपूर्ति को मान्यता दी है, क्योंकि ऐसे मामलों में केवल आर्थिक नहीं बल्कि मानवीय क्षति भी होती है। किंतु मनमानी सार्वजनिक नीतियाँ भी उतनी ही गहरी चोट पहुँचा सकती हैं। किसी अविवेकपूर्ण पात्रता नियम के कारण प्रवेश से वंचित छात्र अपना पूरा शैक्षणिक वर्ष खो सकता है। किसी अनुचित भर्ती नियम के कारण बाहर किया गया अभ्यर्थी अपने जीवनभर के करियर अवसरों से वंचित हो सकता है। वर्षों तक नौकरशाही मुकदमों में उलझा नागरिक ऐसी मानसिक पीड़ा झेल सकता है जिसे बाद का कोई न्यायिक आदेश भी समाप्त नहीं कर सकता।

ये केवल प्रशासनिक असुविधाएँ नहीं हैं; ये मानवीय गरिमा पर आघात हैं।

मनोविज्ञान बार-बार सिद्ध कर चुका है कि लंबी अनिश्चितता, संस्थागत असहायता और अनुभव किए गए अन्याय से मापी जा सकने वाली मानसिक क्षति उत्पन्न होती है। अनियंत्रित नौकरशाही अवरोधों का लगातार सामना करने से चिंता, अवसाद, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप और दीर्घकालिक मानसिक थकान बढ़ती है। असंवेदनशील प्रशासनिक व्यवस्था से लगातार संघर्ष व्यक्ति में वह स्थिति उत्पन्न कर सकता है जिसे मनोवैज्ञानिक ‘सीखी हुई असहायता’ (Learned Helplessness) कहते हैं—जहाँ व्यक्ति न्याय प्राप्त करने की अपनी क्षमता पर विश्वास खो देता है।

विडंबना यह है कि कार्यस्थल पर उत्पीड़न, सड़क दुर्घटनाओं, चिकित्सीय लापरवाही और हिंसक अपराधों के पीड़ितों के मामलों में सरकारें स्वयं मनोवैज्ञानिक साक्ष्यों पर भरोसा करती हैं। यदि उन मामलों में मानसिक पीड़ा का मूल्यांकन संभव है, तो फिर राज्य की मनमानी से उत्पन्न मानसिक कष्ट को कानून में अदृश्य बनाए रखने का कोई ठोस सिद्धांतगत कारण नहीं है।

इसीलिए एक नई संस्थागत व्यवस्था की आवश्यकता है।

जब भी कोई संवैधानिक न्यायालय यह निष्कर्ष निकाले कि किसी सरकारी नीति, विनियमन, अधिसूचना या प्रशासनिक कार्रवाई में मनमानी, स्पष्ट अविवेक या संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तब न्यायालय को यह अधिकार होना चाहिए कि वह मनोवैज्ञानिकों, मनोचिकित्सकों तथा व्यवहार-विज्ञान विशेषज्ञों का एक स्वतंत्र बहु-विषयक पैनल नियुक्त करे, जो प्रभावित व्यक्तियों पर पड़े मानसिक प्रभाव का वैज्ञानिक मूल्यांकन करे।

यह मूल्यांकन न्यायालय के निर्णय का स्थान नहीं लेगा, बल्कि उसे गैर-आर्थिक क्षति का वस्तुनिष्ठ आकलन उपलब्ध कराएगा। इसके आधार पर न्यायालय केवल आर्थिक हानि ही नहीं, बल्कि सिद्ध मानसिक एवं भावनात्मक पीड़ा के लिए भी उपयुक्त मौद्रिक क्षतिपूर्ति प्रदान कर सकेगा।

ऐसी क्षतिपूर्ति सार्वजनिक कोष से दी जानी चाहिए, क्योंकि संवैधानिक अन्याय अंततः राज्य की संस्थागत विफलता का परिणाम होता है। साथ ही, यदि यह सिद्ध हो कि मनमानी किसी सार्वजनिक अधिकारी की लापरवाही, दुर्भावना या लापरवाह निर्णय का परिणाम थी, तो विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन करते हुए उस अधिकारी से भी क्षतिपूर्ति की उचित राशि की वसूली की व्यवस्था होनी चाहिए। अन्यथा नौकरशाही की अविवेकपूर्ण कार्यप्रणाली के विरुद्ध कोई वास्तविक उत्तरदायित्व विकसित नहीं होगा।

कुछ लोग तर्क देंगे कि सार्वजनिक नीतियों में स्वाभाविक रूप से कुछ लोग लाभान्वित होते हैं और कुछ लोग प्रभावित, इसलिए सरकार हर असंतुष्ट नागरिक को क्षतिपूर्ति नहीं दे सकती। किंतु यह प्रस्ताव हर प्रतिकूल परिणाम के लिए क्षतिपूर्ति की माँग नहीं करता। लोकतंत्र में कठिन नीतिगत निर्णय अनिवार्य हैं।

अंतर केवल इतना है कि वैध नीतिगत असहमति और असंवैधानिक मनमानी में स्पष्ट भेद किया जाए।

यदि कोई नीति संवैधानिक सीमाओं के भीतर सावधानीपूर्वक बनाई गई है, तो उसका अलोकप्रिय होना अलग बात है। लेकिन यदि कोई नीति इसलिए निरस्त होती है क्योंकि वह तर्कहीन है, समानता का उल्लंघन करती है, नागरिकों की वैध अपेक्षाओं की उपेक्षा करती है या बिना पर्याप्त औचित्य के उन पर अनुपातहीन बोझ डालती है, तो ऐसी स्थिति में क्षतिपूर्ति असहमति के लिए नहीं बल्कि संवैधानिक अन्याय के लिए दी जानी चाहिए।

ऐसी व्यवस्था से व्यापक संस्थागत लाभ भी होंगे। नीति-निर्माताओं को नई नीतियाँ लागू करने से पहले अधिक गंभीर प्रभाव-अध्ययन करने की प्रेरणा मिलेगी। विभागों को हितधारकों से परामर्श करने, अनुभवजन्य साक्ष्य एकत्र करने, अपने निर्णयों का पारदर्शी औचित्य प्रस्तुत करने तथा संभावित दुष्परिणामों का पूर्वानुमान लगाने की संस्कृति विकसित करनी होगी। तब प्रशासनिक सुविधा संवैधानिक उत्तरदायित्व पर हावी नहीं रह सकेगी।

संविधान केवल राज्य की मनमानी पर रोक नहीं लगाता; वह ऐसे शासन की कल्पना करता है जो अपने नागरिकों के प्रति उत्तरदायी हो। किंतु जब राज्य वर्षों तक किसी नागरिक को टाली जा सकने वाली पीड़ा पहुँचाए और उसके लिए केवल एक प्रतिकूल न्यायिक निर्णय ही उसकी एकमात्र कीमत हो, तब ऐसी जवाबदेही अधूरी रह जाती है।

विलंबित न्याय स्वयं एक पीड़ा है। और पुनर्स्थापन के बिना न्याय अधूरा है।

यदि कोई संवैधानिक लोकतंत्र वास्तव में मानवीय गरिमा का सम्मान करता है, तो उसे यह स्वीकार करना होगा कि मनमाना शासन केवल अधिकारों का उल्लंघन नहीं करता—वह जीवनों को घायल करता है। जब राज्य अपनी अविवेकपूर्ण और असंवेदनशील नीतियों के माध्यम से अनावश्यक मानवीय पीड़ा का निर्माता बन जाता है, तब संवैधानिक उपचार केवल उस नीति को निरस्त करने तक सीमित नहीं रहने चाहिए; उन्हें उन अदृश्य घावों को भी स्वीकार करना चाहिए जो नागरिक के जीवन पर छोड़ दिए गए हैं।

तभी संवैधानिक शासन केवल अपनी त्रुटियों को सुधारने तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उनके कारण हुई मानवीय क्षति की वास्तविक भरपाई करने की दिशा में भी आगे बढ़ सकेगा.